Sunday, October 19, 2014

हिलमिल दीप जलाएं

मित्रों 
इस दिवाली  …

माटी के इस दीपक की छोटी सी है एक कहानी। 
माटी की है देह, नेह का तरल, और  परनाली। 
नेह देह में भरा, नेह की ऊर्जा बीच समानी। 
गुरु की चिनगी चिनगी पाकर दीपक देता जोत सुहानी। 
रामनारायण सोनी 

आओ इस दीवाली, हिलमिल दीप जलाएं --

पहला दीप- अंधेरों में पड़े उन आत्मीय रिश्तों को फिर रोशन करने के लिए। 
दूसरा दीप -उस चौपाल पर, जहाँ लोग अपने सुख दुःख साझा करते हैं। 
तीसरा दीप -उस बरगद के तले, जो अनवरत छाया और पंछी को प्रश्रय देता है। 
चौथा दीप - उस नदी के तट पर, जो बिना भेदभाव के सबको नीर देती है। 
पाँचवाँ दीप -उस आकाश को समर्पित हो, जो सबको प्राणवायु देकर अपान अपने स्वयं में समेट लेता है। 
छठवाँ दीप - उस शहीद समाधि पर धरा की आबरू के लिए धराशायी हो कर तिरंगे में लिपट गया। 
इसी तरह के कई डीप आपकी झोली में है।  एक-एक जलाएं और जहां को रौशनी से भर दें। 

आओ इस दीवाली, हिलमिल दीप जलाएं --

रामनारायण सोनी
शुभ दीपावली 

सर्जना मंच 

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