Monday, November 5, 2012

अजमीढ़ जयंती

            अजमीढ़ जयंती 

         विशेष रंगारंग कार्यक्रम 




चुनिन्दा तस्वीरें

माननीय श्री राजमल जी सोनी वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष  अखिल भारतीय स्वर्णकार  संघ 


संक्षिप्त परिचय :

जन्म स्थान एवं निवास: ग्राम _कानड, जिला_शाजापुर, मध्य प्रदेश 
व्यक्तित्व: जुझारू कांग्रेस कार्यकर्त्ता, कुशल नेतृत्व, आदर्श एवं समर्पित समाज सेवी, कुशल संगठक, समाज की प्रत्येक इकाई को    संगठन में जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध 
वर्त्तमान राजनैतिक पदांकन : कानड कृषि उपज मंडी अध्यक्ष 

नींबू  रेस 

चेयर रेस 

मुख्य  अतिथी  श्री  राजमल जी  सोनी  का ग्रुप अध्यक्ष  श्री  पन्नालाल  जी  सोनी द्वारा  स्वागत 

श्री मनोहरलाल जी का  सम्मान 

मंच : श्री बसंतीलाल जी सोनी (वरिष्ट सदस्य), श्री पन्नालाल  जी सोनी  (वर्तमान ग्रुप अध्यक्ष ),  मुख्य  अतिथी माननीय श्री राजमल जी सोनी ), श्रीमती  गीता सोनी ( ग्रुप  उपाध्यक्ष  ), श्री राजेश जी सोनी (ग्रुप कोषाध्यक्ष ) 

अदिती : नृत्य  : भावपूर्ण मुद्रा 

अदिती : कविता पाठ 

वरिष्टों का सम्मान 

मातृ शक्ति 

ग्रुप सदस्य 

काव्य पाठ : श्री बसंतीलाल जी सोनी 

श्री सुभाषजी सोनी : वरिष्ट सदस्य एवं कार्यक्रम संचालक 

श्रीमती गीता सोनी (उपाध्यक्ष )

श्री राजेश जी सोनी (कोषाध्यक्ष) 

श्री पन्नालाल जी सोनी (अध्यक्ष)

गुफ्तगू 

विचार विमर्श 
श्री मनोहरलाल जी सोनी (ग्रुप के सृजक) का संबोधन  

आवाहन 

अभिनन्दन पात्र वाचन : द्वारा श्री देवनारायण जी सोनी 


मुख्य अतिथि का उद्बोधन 

पुरुष्कार वितरण_आशीष 

पुरुष्कार वितरण

जोश _ उत्साह 

पुरुष्कार वितरण

काव्य पाठ 

सम्मान : रामनारायण सोनी ----आय टी सपोर्ट, प्रचार, बोद्धिक प्रकोष्ठ, वेब साईट निर्माण 


गीत_ग़ज़ल की मधुर संगीतमय प्रस्तुति : रामनारायण सोनी 






Sunday, May 20, 2012





ग्रुप में प्रतिभा खोज

आदरणीय बंधुओं
अपने ग्रुप मे, अपने समाज में, अपने परिवार में मौजूद प्रतिभाओं को इस पृष्ठ के माध्यम से खुला निमंत्रण है.

उनके विकास में आप सहयोगी हों, उनकी प्रतिभाओं को हम सम्मनित करे उसका पोषण करे। इन्टरनेट एक अत्यधुनिक शशक्त माध्यम है। अपने नौनिहालों को इससे सम्बद्ध कर आज की विकास दौड़ में शामिल करें . यह अवसर आपको मुफ्त में इस पृष्ठ पर उपलब्ध होगा. अपनी रचना हिंदी अंग्रेजी में प्रेषित कर। इस हेतु डाक समिति के पते पर भेजें. इ-मेल swarnkarsocialgroup@gmail.com पर भेजें. अपनी रचनाएं टाइप, हस्तलिखित और दिनांक हस्ताक्षर साईट प्रेषित करें। केवल मौलिक रचनाएं स्वीकार की जावेगी. रचना गद्य, निबंध, पद्य, कविता, गीत, मुक्तक आदि के रूप में स्वीकार की जा सकेगी. प्रेषित रचना मे आवश्यक संपादन कर प्रकाशित की जावेगी . यदि रचनाकार अपना फोटो भी रचना के साथ प्रकाशित करवाना चाहता है तो  स्केन कॉपी मेल द्वारा  करें। 
आपको यह बताना यहाँ उपयुक्त होगा कि  आपकी प्रकाशित रचना को विश्व भर में देखा-पढ़ा जावेगा.



मैं आवाहन  करता हूँ
सोया पथिक जगाता हूँ

प्रतिभा को मत दफन करो
आगे बढ़ो ओ सृजन करो


मुंदी आँख के सपने छोडो खुले नयन से सपने देखो.
सपनों का पीछा कर देखो सपने मूर्त बना कर देखो.

संकल्पों को कल्प करो निज अतीत का  मान करो
तुम वीरों के यस्कर हो  अपने पर विश्वास करो

सृजन विकास का मूल सृजन तुम्हारे रक्त बसा
तुम श्रृंगार विधाता हो तुम प्रबुद्ध हो ध्यान करो
तुम्ही बताओ और किसी के बसने की भी धूल बीके
सदियों तक पोषक बन पाए सौ वंशो तक एक कला के

जिन हाथो में कला बसी थी उसमें कलम थमा कर देखो
पिंडों को आकार दिया है अब व्यक्तित्व सजा कर देखो
जंग लगी औजारों में क्यों इस पर जरा विचारो तुम
नवयुग की नवशक्ति धरो अब अपना स्वयं निखारो तुम


तुम अपनी शक्ति भूल रहे तुम भूले किस के वंशज हो
तुमने इतिहास नहीं जाना ना दिव्य पुराणों को माना
ना चारण भाट मिले ऐसे जो खोल सके पोथा पाना
तुम विशुद्ध हो जग प्रसिद्द हो तुमने तुम्हे नहीं जाना

मैंने  क्षुद्र प्रयास किया है मित्रों तुम से तुम्हें मिलाने का
वर्णो से ही जाति बनी और जाति बनी व्यसायों से 
मैढ़  जाति के क्षत्रीय सब युद्धों के कुशल खिलाड़ी थे 
और प्रशासन में  पारंगद सब राज काज में सहभागी थे 

उनमें से  जो कला निपुण थे स्वर्णकार कहलाए 
स्वर्णकला जीवन यापन का अविरल उद्योग  बनाए 
यही हमारा उदय बिंदु था आज सिन्धु बन जाए 
मेरी अभिलाषा उज्जवल है चौदह रत्न इसीमें पाएं 

चन्द्र वंश के वंशज थे शीर्ष पुरुष अजमीढ हमारे
वंशवृक्ष के मूल हुए हैं आओ गौरव गान संवांरें 
उचित समय है  आज करें हम मूल्यांकन खुदका ही
क्या हम भूल चुके परिचय सब उनका और अपना भी 

इसीलिए  करुणा  से मेरा ह्रदय भरा जाता है
हमने कभी नहीं क्यों सोचा किन पुरखों से नाता है
जिन हाथो में कला बसी थी उसमें कलम थमा कर देखो
पिंडों को आकार दिया है अब व्यक्तित्व सजा कर देखो


श्रीमद्भागवद भगवान का वांग्मय स्वरूप है
समस्त पुराण ऋषियों की पवित्र वाणी है
महाभारत को पांचवां वेद कहा है
इन सब में अध्यात्म के साथ ईश्वर की भक्ति, सगुन निर्गुण की उपासना का विषद वर्णन है. इनमें चन्द्र वंश, सूर्य वंश, महाराज पुरु से लेकर महाराजा अजमीढ  और उनके बाद के काल तक का इतिहास लिखा है . इनके सन्दर्भों का हम अलग से विचार करेंगे. मैं इस आलेख के माध्यम से समाज में विद्यमान उत्कृष्ट प्रतिभाओं को आहूत करूँगा की इस  में विशिष्ट कार्य कर समाज को और स्वयं को गौरवान्वित करें. 

रामनारायण सोनी 

शर्तें ..
1) आपकी भेजी गई रचना को ब्लॉग आथर को प्रकाशित करने अधिकार होगा.
2) रचना के लिए कोई मानदेय प्रदान नहीं किया जावेगा 

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Friday, May 18, 2012

श्री मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार जाति का इतिहास


श्री  गणेशाय नमः

श्री मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार जाति के इतिहास के ज्ञान के पूर्व  भारतवर्ष में आर्य सभ्यता, उनकी सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक, तथा आर्थिक, आधार पर विकास और  वंशानुक्रम का जानना आवश्यक होगा. इन सभी संकायों का विस्तृत विवेचन इतिहासकारों ने अपने अपने स्तर से अपने अपने ढंग से किया है. इनके द्वारा लिखे गए तथ्य आवश्यक नहीं है कि वर्तमान में जो हमें बताया जां रहा है यथा स्वरूप हो. विश्वं में केवल हमारा  देश है जहाँ सबसे पहले सभ्यता का जन्म हुआ है। हमारी संस्कृति सनातन है. संस्कृति अर्थात संस्कारों और विचारधाराओं का गंगा जमनी संगम . संस्कृति के इस पावन प्रवाह में आत्मा, परमात्मा, जगत , समाज  और जीवन की हर विधा में आदर्श पुरुषों ने अपनी संस्कृति धारा का सूत्रपात किया है. वस्तुतः सनातन संस्कृति से उपजी भारतीय सभ्यता ने संस्कारों से ओतप्रोत समाज का निर्माण किया. मानव जीवन के सर्वंतोभद्र-सम्यक्‌ प्रवाह और सामाजिक व्यवस्था के लिए वर्नाश्रम धर्म का विवरण सम्पूर्ण  विश्व् जानता है. इस वर्ण व्यवस्था का उल्लेख वेदों , शास्त्रों और पुराणों में है. इसे सभी काल  के इतिहासकारों ने स्वीकारा है. 
                                                              क्रमशः .............................

रामनारायण सोनी 

http://maidhyuvak.com/2011/02/hello-world/ swarnkarutthan.blogspot.com
Maidh Yuvak maidhyuvak.com

Thursday, March 22, 2012

नव संवत्सर में नवजीवन का संदेश गुड़ी पड़वा ‍विशेष

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शुभ कामनाएँ ,

चैत्रे मासि जगत्‌ ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥

कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इसे प्रतिपदा तिथि को प्रवरा अथवा सर्वोत्तम तिथि कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोपण, वर्षेश का फल पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं।
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।
उत्सवों का प्रारंभ :- कहा जाता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में अवतार लिया था। सूर्य में अग्नि और तेज हैं और चन्द्रमा में शीतलता, शान्ति और समृद्वि का प्रतीक सूर्य और चन्द्रमा के आधार पर ही सायन गणना की उत्पत्ति हुई है। इससे ऐसा सामंजस्य बैठ जाता है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास आदि व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते। तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चन्द्रग्रहण सदैव पूर्णिमा को ही होगा।
नया संवत्सर प्रारम्भ होने पर भगवान की पूजा करके प्रार्थना करनी चाहिए। हे भगवान! आपकी कृपा से मेरा वर्ष कल्याणमय हो, सभी विघ्न बाधाएँ नष्ट हों। दुर्गा जी की पूजा के साथ नूतन संवत्‌ की पूजा करें। घर को वन्दनवार से सजाकर पूजा का मंगल कार्य संपन्न करें। कलश स्थापना और नए मिट्टी के बरतन में जौ बोए और अपने घर में पूजा स्थल में रखें।

एक प्राचीन मान्यता है कि आज के दिन ही भगवान राम जानकी माता को लेकर अयोध्या लौटे थे। इस दिन पूरी अयोध्या में भगवान राम के स्वागत में विजय पताका के रूप में ध्वज लगाए गए थे। इसे ब्रह्मध्वज भी कहा गया।
यह भी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही सृष्टि की रचना की। श्री विष्णु भगवान ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही प्रथम जीव अवतार (मत्स्यावतार) लिया था। यह भी मान्यता है कि शालिवाहन ने शकों पर विजय आज के ही दिन प्राप्त की थी इसलिए शक संवत्सर प्रारंभ हुआ।
एक मान्यता यह भी है कि मराठा साम्राज्य के अधिपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही हिन्दू एक मान्यता यह भी है कि मराठा साम्राज्य के अधिपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही हिन्दू पदशाही का भगवा विजय ध्वज लगाकर हिंद साम्राज्य की नींव रखी।
धार्मिक दृष्टि से फल, फूल, पत्तियाँ, पौधों तथा वृक्षों का विशेष महत्व है। चैत्र मास में पेड़-पौधों पर नई पत्तियों आ जाती हैं तथा नया अनाज भी आ जाता है जिसका उपयोग सभी देशवासी वर्ष भर करते हैं, उसको नजर न लगे, सभी का स्वास्थ्य उत्तम रहे, पूरे वर्ष में आने वाले सुख-दुःख सभी मिलकर झेल सकें ऐसी कामना ईश्वर से करते हुए नए वर्ष और नए संवत्सर के स्वागत का प्रतीक है गु़ड़ी पड़वा।
12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।

प्राचीन संवत : 
विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है।सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी।

विक्रम संवत : 
इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे इसीलिए उनके नाम पर ही इस संवत का नाम है। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ।

नव संवत्सर : 
जैसा ऊपर कहा गया कि वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है।चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है।
सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं।
लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है। 

नववर्ष की शुरुआत का महत्व: 
नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।
इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।
ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।


रामनारायण सोनी


Thursday, March 8, 2012

SWEET MEMORIES OF AJMEEDH JAYANTI _DATE 28.12.2008

IN THE MEMORY OF AADI PURUSH SHRI AJMEEDH JI MAHARAJ

RAMNARAYAN SONI__ THE PRESENTER OF SERVICE TO THE SOCIAL GROUP
                                                               Mrs. SHAKUMTALA  SONI                                      

SH MANOHARLAL JI THE ORIGINATOR OF THE SOCIAL GROUP
AND  SHRI SH RAMESH JI VERMA FOREMOST CREATOR OF DYNAMICS IN THE GROUP






Smt. GITA SONI _FORE STEP LADY OF THE GROUP