Saturday, February 1, 2014

सामाजिक विकास के पाठ

सामाजिक विकास के पाठ





तमसो मा ज्योतिर्गमय


· समाज को अपनी आस्थाओं के प्रति दृढ़ बनाना आज की आवश्यकता है। समाज में समरसता निर्माण हो तभी संपूर्ण एकता संभव है।


· विज्ञानं ने अखिल विश्व को सिकोड़कर एक पड़ोस बना दिया है !” इस बात की सत्यता एवं प्रामाणिकता वर्तमान परिदृश्य की भौतिकता के आधुनिक दौर में हुए तकनीकी विकास को देखकर लगाया जा सकता है !


· जातियों के पास ये अधिकार है के वो निर्णयों में भाग लें जो की उनके जीवन और काम की स्थिति को प्रभावित करते हैं


· सिर्फ़ भाग लेने के साथ निर्णय लेने की शक्ति ही चिरस्थायी और सृजनात्मक है.


· "भागीदारी" एक ऐसा रिश्ता है जिसमे जो पक्षो के बीच सम्मति है उनमे कुछ हद्द तक बराबरी होती है.


· आपका काम समाज को निर्भरता से दूर लेजाने का है.


· योग्यता विकास के लिए आवश्यक है औरतों, बच्चों और जवानों में बराबर भाग को बढ़ाना .


· समाज के पास श्रोत होने चाहिए . योग्यता विकास ऐसे ही श्रोतों .. कर सकता है


· जागरूकता और योग्यता विकास की भागीदारी ही समाज, गैर सरकारी संस्थाओं और नागरिक प्राधिकारों के बीच ज्यादा समानता कर सकती है


· सामाजिक विकास जो की व्यक्तियों के परिश्रम द्वारा योजनाबद्ध है , बड़ी संख्या में समाज से सम्भव है.


· सबसे जरुरी है सामाजिक विकास के तत्वों को लगातार देखना


· दान ही सामाजिक निर्भरता में मददगार बनाती रामनाराय सोनी




सामाजिक विकास एक बहुआयामी पद है, इसे कुछ निश्चित परिभाषाओं या सीमाओं के अंतर्गत देखना कठिन है. सामाजिक विकास को परिभाषित करने से पहले हमें विकास को जानना ज़रूरी है. विकास का अर्थ एक निश्चित स्थिति से आगे की ओर प्रगति, परिवर्तन और उन्नति से है. प्रगति-परिवर्तन की यह मात्रा और गुण दोनों स्पष्ट रूप से दिखाई देने चाहिए. समाज के हर तबके की उसमे हिस्सेदारी हो कोई वंचित या छूट गए या खो गए लोग नहीं होने चाहिए और तभी हम मान सकते हैं कि विकास की दिशा और दशा सही जा रही है. सामाजिक विकास एक समग्र प्रक्रिया है जो अपने भीतर एक निश्चित समाज की समस्त संरचनाओं यथा -आयु, लिंग, सम्पत्ति तथा संस्थाओं जैसे -परिवार, समुदाय, वर्ग, शिक्षा आदि को समेटे है. उदाहरण के लिए समाज की संरचनाएं और उनसे जुड़े रीति-रिवाज एक आधुनिक समाज से पूर्णतया भिन्न होंगी. समाज मुख्यतया कुल, परिवार, रक्त सम्बन्ध आधारित होता है.
वर्तमान आधुनिक और उत्तर आधुनिक समाजों में विकास को शिक्षा के प्रसार से पैदा हुई जागरूकता और धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के कमज़ोर होते हुए बंधनों, महिलाओं और विभिन्न समूहों की स्थिति में आये परिवर्तन और समाज में बन रही नवीन संरचनाओं व संस्थाओं के रूप में देखा जा सकता है.

अब नई संरचनाओं की बात की जाए जो सामाजिक विकास के प्रत्यक्ष परिणामों को दिखाती हैं ---

शिक्षा के प्रसार ने लोगों के मानसिक-बौद्धिक स्तर को उठाया , उनके लिए नए आर्थिक अवसरों और क्षेत्रों को जनम दिया . सबसे महत्वपूर्ण लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी, उन्हें प्राप्त करने और उनकी सुरक्षा के विषय में सचेत किया. शिक्षा ने लोगों को उन्मुक्त किया , उन्हें परम्परागत बंधनों व रुढियों की फिर से समीक्षा करने को प्रेरित किया है. महिलाओं का पुरुषों के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में काम करना, देर रात तक काम करना ,समाज में लैंगिक भेदभावों का कम होना, लड़कियों की शिक्षा -व्यवसाय और विवाह के प्रति बदलती मानसिकता और समाज द्वारा उनकी स्वीकृति. ये सब विकास की ही प्रक्रिया का अंग हैं. ये सब सामाजिक विकास के विविध पहलुओं को दिखाता है.सामाजिक विकास की बात करते समय हम राजनीति और अर्थ को उपेक्षित नहीं कर सकते. क्योंकि यही किसी भी समाज को चलाने वाली दो प्रमुख चालक शक्तियां हैं, बहुत सीमा तक विकास प्रक्रिया की सफलता-असफलता इन्ही दो बिन्दुओं पर परखी जाती है. आय की विषमताएं और आर्थिक अवसरों और उनसे पैदा होने वाले सामाजिक तनावों आदि को मुख्य रूप से देखा जाना चाहिए. लेकिन सामाजिक विकास केवल इन्ही दो बिन्दुओं पर नहीं आँका जा सकता क्योंकि ऐसा देखा गया है कि कई देशों में आर्थिक या राजनीतिक विकास तो हुआ लेकिन सामाजिक दृष्टि से पिछड़ापन और सामंती समाज की प्रथाएं बनी रहीं है..जैसे मध्य पूर्व के देशों जैसे ईरान या सउदी अरब में हम देखते हैं कि अर्थव्यवस्था तो पर्याप्त विकसित हैं लेकिन लोगों को नागरिक स्वतंत्रताएं नहीं मिली हैं. महिलाओं की सार्वजानिक भागीदारी पर बहुत सी बंदिशें हैं. गरीबी और भुखमरी की गंभीर समस्या, जातिवाद और आरक्षण की राजनीति का बढता प्रभाव, ये सब सामाजिक विकास की बड़ी खामियां हैं.
सामाजिक विकास की बात करते वक़्त हम आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और आधुनिक संचार/सूचना तकनीक के पक्ष को रेखांकित करना नहीं भूल सकते. क्योंकि ये महज़ एक प्रक्रिया नहीं अपितु अपने आप में एक क्रान्ति है, जिसने सामाजिक विकास की प्रक्रिया की गति को तीव्रतर कर दिया है..सूचना/ संचार क्रांति ने सभी परम्परागत सामाजिक-सांस्कृतिक बंधनों को तोड़ दिया है या यूँ कहें कि उन्हें एकदम हाशिये पर धकेल दिया है अब हमारे सामजिक सम्भंधों को बनाये रखने और उन्हें विस्तृत करने में मोबाइल फोन, पर्सनल कंप्यूटर, फेसबुक, ट्विटर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं.
"संस्कृति" "ग्लोबल" होती जा रही है और "ग्लोब" "लोकल" हो रहा है. अब चूँकि हर सवाल का जवाब गूगल या याहू पर उपलब्ध है, ऐसे में समाज और उसका विकास केवल अपने आस-पास के वातावरण से नहीं अपितु वैश्विक सन्दर्भों से भी प्रभावित होता है. उदाहरण के लिए सरकार जब भी सामाजिक सरोकारों से जुडी कोई नीति/योजना बनाती है फिर चाहे वो जनसँख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा या चाहे क़ानून व्यवस्था का मुद्दा हो.. हम तुरंत उसकी तुलना विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रही वैसी ही अन्य योजनाओ से करते हैं..उसे जांचते हैं और उसे अपने सन्दर्भ में लागू करने के लिए सुझाव ढूंढ लाते हैं.
अंततः सामाजिक विकास का कोई निश्चित प्रतिमान या खाका नहीं हो सकता. सामाजिक विकास कहने और देखने में भले ही एक सामूहिक प्रक्रिया है लेकिन इसके प्रभाव और परिणाम व्यक्तिगत स्तर पर ज्यादा बेहतर ढंग से देखे जा सकते हैं और इसलिए विकास को विभिन्न सन्दर्भों जैसे आर्थिक सशक्तिकरण, शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और दूसरी सामजिक सुरक्षा की गुणवत्ता युक्त उपलब्धता आदि में देखना होगा. आधुनिक समाज में अपनी पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का तालमेल मान्यताओं के साथ बिठाना विकास के मुख्य मुद्दे हैं.
अतः हमारे लिए एक समग्र और समावेशी विकास प्रक्रिया की आवश्यकता है.जिसमे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लाभों का समान और न्यायपूर्ण वितरण भी शामिल हो साथ ही हमें ये भी समझ लेना चाहिए कि सामाजिक विकास कोई नीति निर्माण, सरकारी कानूनों या निर्णयों से निर्देशित या नियंत्रित होने की चीज़ नहीं है इसके बजाय इसका सीधा सम्बन्ध प्रगतिशील मानसिकता, समय के अनुसार खुद को ढालने और सामंजस्य बिठाने और नए तथा पुराने के बीच एक समन्वय पर आधारित जीवनशैली से है.

रामनाराय सोनी