समाज और संस्कृति
मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समूहों में रहता है। विश्व के समस्त जीवधारियों में केवल वही संस्कृति का निर्माता है। इसके ही माध्यम से एक पीढ़ी की संचित अनुभूति भविष्य की पीढ़ियों को मिलती है। प्रत्येक पीढ़ी की संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति जीवन का वह भाग है जिसका निर्माण मानव स्वयं करता है। ई. बी. टाइलर के अनुसार संस्कृति उस समुच्चय का नाम है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नीति, विधि, रीति-रिवाज़ तथा अन्य ऐसी क्षमताओं और आदतों का समावंश रहता है ।मानव उन तरीकों का अध्ययन करता है जिससे मानव अपनी प्राकृतिक एवं सामाजिक स्थिति का सामना करता है, रस्म रिवाजों को सीखता और उन्हें एक पुश्त से अगली पुश्त को प्रदान करता है। भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में एक ही साध्य के कई साधन हैं। पारिवारिक संबंधों का संगठन निर्माण के सिद्धांत प्रत्येक समाज में अलग-अलग है। आंतरिक विकास या बाह्य संपर्क के कारण परंपरा के स्थिर रूप भी बदलते हैं। व्यक्ति एक विशेष समाज में जन्म लेकर उन रस्म-रिवाजों को ग्रहण करता है, व्यवहार करता है, और प्रभावित करता है जो उसकी सांस्कृतिक विरासत हैं।सांस्कृतिक अध्ययन जाति के रस्म-रिवाजों के समूह को एक समष्टि के रूप में अध्ययन करने का प्रयास हैं। संस्कृति पर विचार करने के लिए वे उस समाज के लोगों का तकनीकी ज्ञान, आर्थिक जीवन, सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएँ, धर्म, भाषा, लोकवार्ता एवं कला का अध्ययन करते हैं। समाज के सदस्य अपने परिसर से समवस्थित होते हैं।
संस्कृति के गुण निम्नलिखित हैं-
(1) मानव संस्कृति के साथ जन्म नहीं लेता, पर उसमें संस्कृति ग्रहण करने की क्षमता होती है। वह उसे सीखता है। इस प्रक्रिया को संस्कृतीकरण कहते हैं।
(2) संस्कृति का उद्भव मानव जीवन के मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक अंगों से होता है। उसके निरूपण और विकास में इन तत्वों का बहुमूल्य योग होता है।
(3) संस्कृति के विशिष्ट छोटे भाग को सांस्कृतिक तत्व कहते हैं। कई तत्वों को मिलाकर एक तत्व समूह होता है। एक संस्कृति में अनेक सांस्कृतिक तत्व समूह होते हैं। संस्कृति में एक या अधिक प्रेरक सिद्धांत होते हैं जो उन्हें विशिष्टता प्रदान करते हैं।
(4) संस्कृति अनेक विभागों में विभक्त होती है, जैसे भौतिक संस्कृति (तकनीकी ज्ञान और अर्थव्यवस्था), सामाजिक संस्थाएँ (सामाजिक संगठन, शिक्षा, राजनीतिक संगठन) धर्म और विश्वास, कला एवं लोकवार्ता, भाषा इत्यादि।
(5) संस्कृति परिवर्तनशील है। संस्कृति के प्रत्येक अंग में परिवर्तन होता रहता है, किसी में तीव्रता से, किसी में मंद गति से। बाह्य प्रभाव भी बिना सोचे-समझे ग्रहण नहीं किए जाते। किसी में विरोध कम होता है, किसी में अधिक।
(6) संस्कृति में विभिन्नताएँ होती हैं जो कभी-कभी एक ही समाज के व्यक्तियों के व्यवहार में प्रदर्शित होती हैं। जितनी छोटी इकाई होगी उतना ही कम अंतर उसके सदस्यों के आचार-विचार में होगा।
(7) संस्कृति के स्वरूप, प्रक्रियाओं और गठन में एक नियमबद्धता होती है जिससे उसका वैज्ञानिक विश्लेषण संभव होता है।
(8) संस्कृति के माध्यम से मानव अपने संपूर्ण परिसर से समवस्थित होता है और उसे रचनात्मक अभिव्यक्ति का साधन मिलता है।
मानव विकास के कितने ही गूढ़ रहस्य प्रागैतिहास के गर्भ में पड़े हैं। प्रागैतिहासिक पुरातत्ववेत्ता पृथ्वी के नीचे से खुदाई करके प्राचीन संस्कृतियों की छानबीन करते हैं। उसके आधार पर वे मानव विकास का क्रमबद्ध स्वरूप निश्चित करते हैं। खुदाई से भौतिक संस्कृति की बहुत-सी चीजें उपलब्ध होती हैं। अनुमान एवं कल्पना की सहायता से उस संस्कृति के सदस्यों के रहन-सहन, आचार-विचार, सामाजिक संगठन, धार्मिक विश्वास इत्यादि की रूपरेखा तैयार करते हैं।
भाषा के ही माध्यम से संस्कृति का निर्माण हुआ है। सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य ने अनेक तरह से अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को व्यक्त करने का प्रयास किया। पहले तो हाव-भाव तथा संकेत चिन्हों से काम चला। बाद में उसी ने भाषा का रूप ग्रहण कर लिया। प्रत्येक भाषा में उसके बोलने वालों की सारी मान्यताएँ, स्पष्ट तथा अस्पष्ट विचार, बौद्धिक और भावनात्मक क्रियाएँ निर्हित रहती हैं। समाज के सभी सांस्कृतिक तत्व उसकी भाषा के भंडार में सुरक्षित रहते हैं।कहावतें, पहेलियाँ, लोककथाएँ, लोकगीत, प्रार्थना मंत्र, इत्यादि में समाज का संस्कार प्रदर्शित होता है। समाज की अंतर्मुखी वृतियों से परिचय प्राप्त करने के लिए भाषा का ज्ञान अत्यावश्यक है। संबंध सूचक शब्दावली से समाज में पारिवारिक और दूसरे संबंधों का पता चलता है। संस्कृति पर बाह्य प्रभावों के कारण जो परिवर्तन होता है वह भी भाषा में प्रतिबिंबित होता है। नए विचार और नई वस्तुएँ जब व्यवहार में आने लगती हैं तो उनके साथ नए शब्द भी आते हैं। इस प्रकार संस्कृति और भाषा दोनों का समान रूप से विकास होता है। भाषा के स्वरूप का विश्लेषण करने से हम सांस्कृतिक रहस्यों को सुलझा सकते हैं। संरचनात्मक तत्वों और प्रक्रियाओं के ज्ञान से हमें भाषा शास्त्र की कुछ समस्याओं पर समाधान मिल सकता है। सांस्कृतिक अध्ययन के अंतर्गत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन, धर्म, भाषा, कला इत्यादि का अध्ययन आता है।
सामाजिक संस्कृति - समाज का संस्थाबद्ध सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन करता है, जैसे परिवार, नातेदारी, व्यवस्था, राजनीतिक संगठन, विधि, धार्मिक मत इत्यादि। कार्यवादी विचारधारा के प्रचलन के बाद समग्र रूप में समाज के अध्ययन की आवश्यकता मालूम हुई।
आर्थिक मानवशास्त्र
न्यूनतम परिश्रम से दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिन मानव संबंधों और प्रयास का संगठन किया जाता है उसे। भोजन प्राप्त करने और उत्पन्न करने के अनेक तरीके विभिन्न जातियों में प्रचलित हैं। उनके आधार पर चार मुख्य स्तर पाए जाते हैं-संकलन-आखेटक-स्तर, पशुपालन स्तर, कृषि स्तर और शिल्प-उद्योग-स्तर।अर्थव्यवस्था में व्यापार विनिमय का विशेष महत्व है। उपहारों से व्यक्तिगत तथा सामूहिक संबंध सुदृढ़ बनाए जाते हैं। व्यापार और विनिमय में उत्पादन के वितरण और आर्थिक संगठन का महत्व अधिक होता है। अर्थव्यवस्था भौतिक संस्कृति एवं लोगों की तकनीकी क्षमता पर निर्भर होती है, तरीकों तथा उद्योग-धंधों का अध्ययन भी इसी के अंतर्गत आता है। पहले के मानव शास्त्री इस प्रकार के अध्ययन में अधिक रुचि रखते थे और उनके प्रयासों के फलस्वरूप विदेशों के संग्रहालय आदिम भौतिक संस्कृति की वस्तुओं से भरे पड़े हैं।
धार्मिक मानवशास्त्र
अदृश्य एवं अज्ञात शक्तियों को जानने की अभिलाषा मनुष्य को सदा से ही रही है। किसी भी समाज के संगठन, उपलब्धियों तथा प्रगति के अध्ययन करते समय धार्मिक पृष्ठभूमि से परिचय प्राप्त करना आवश्यक है। धर्म हममें सुरक्षा की भावना जगाता है। एक धर्म के अनुयायी एकता के दृढ़ सूत्र में बँधे रहते हैं। धर्म की छाप हमें समाज के समस्त क्रियाकलापों पर मिलती है। कला, साहित्य, संगीत, नृत्य इत्यादि प्रारंभ में धार्मिक भावना से ही अनुप्राणित थे। उनका अध्ययन भी सांस्कृतिक मानव शास्त्र के अंतर्गत आता है।
संस्कृति का उद्गम एवं विकास
मानव संस्कृति के विकास के तीन स्तर हैं। निम्नतम स्तर जंगलीपन, मध्य स्तर को बर्बरता और उच्चतम स्तर को सभ्यता की संज्ञा दी गई। संसार के विभिन्न भागों में सांस्कृतिक समानताओं का कारण एक प्रकार से सोचने की प्रवृत्ति है। प्रसारवाद के सिद्धांत के अनुसार संस्कृति का उद्गम कुछ स्थानों पर हुआ और वहीं से वह फैली। मनुष्य की आविष्कार शक्ति अत्यंत सीमित होती है और ग्रहण शक्ति अपरिमित है। इसमें संदेह नहीं कि आविष्कार और प्रसार द्वारा संस्कृतियों का रूप बदलता है। अन्य संस्कृतियों के तत्व कई कारणों से ग्रहण किए जाते हैं। कुछ तो दबाव के कारण अपनाए जाते हैं, कुछ नवीनता के लिए, कुछ सुविधा के लिए और कुछ लाभ के लिए। कुछ नवीन तत्व प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अपनाए जाते हैं। बार्नेट ने संस्कृति परिवर्तन का नया विवेचन प्रस्तुत किया है। वे उत्प्रेक्षण (Innovation) को संस्कृति-परिवर्तन का आधार मानते हैं। उत्प्रेक्षण मानव की इच्छाओं से उत्पन्न होते हैं। यद्यपि वे संस्कृति परिवर्तन के कारण होते हैं, फिर भी वे स्वयं सांस्कृतिक परिस्थितियों और कारकों से अछूते नहीं रहते। उत्प्रेक्षण की सफलता के लिए असंतोष की स्थिति आवश्यक है।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment